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सुमी अलकेब्सी
कम्युनिकेशंस और मार्केटिंग डायरेक्टर
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दोहा में अंतरराष्ट्रीय विचारक और छात्र निष्पक्षता, विशेषाधिकार और सफलता के अर्थ से जुड़ी एक जोशीली बहस में शामिल होते हैं।
क्या सफलता सचमुच कमाई जा सकती है? अपने ताज़ा और महत्त्वपूर्ण एपिसोड में, Qatar Foundation के Doha Debates में अंतरराष्ट्रीय विचारकों और छात्रों के बीच इस विषय को लेकर एक विचारोत्तेजक बहस होती है — क्या कड़ी मेहनत और प्रतिभा से ही कामयाबी तय होती है या फिर "कमाई हुई सफलता" की गहराई में असमानताएँ छिपी होती हैं।
येल लॉ स्कूल के गाइडो कालाब्रेसी लॉ प्रोफ़ेसर, डेनियल मार्कोविट्स का तर्क है कि निष्पक्षता को बढ़ावा देने के इरादे से तैयार किए गए सिस्टम ने असल में असमानता को बढ़ावा दिया है। वे कहते हैं, “काबिलियत को तरजीह देने का फ़लसफ़ा ही सबको समान अवसर देने के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बन गया है।” वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि प्रतिष्ठित शिक्षा और विरासत में मिले लाभ पर टिकी प्रतिस्पर्धा ने सार्थक उन्नति की जगह ले ली है।
जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर, ब्रायन कैपलान का दृष्टिकोण इससे काफ़ी अलग है। वे कहते हैं, “काबिलियत को तरजीह देना एक सच्चाई है, बशर्ते हर किसी को हर कहीं काम करने की आज़ादी मिले।” कैपलान का मानना है कि समृद्धि व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी और आने-जाने की आज़ादी पर निर्भर होती है, सिस्टम में किए जाने वाले बदलावों पर नहीं।
कोपनहेगन बिज़नेस स्कूल की एसोसिएट प्रोफ़ेसर, डॉ. पूर्णिमा लूथरा इस विचार को चुनौती देती हैं कि हर किसी को समान अवसर मिलते हैं। वे कहती हैं, “काबिलियत को तरजीह देना एक मान्यता है, एक ऐसा सिस्टम जहाँ यह माना जाता है कि लोगों को सिर्फ़ उनकी काबिलियत के आधार पर अवसर मिलना चाहिए।” “सच्चाई यह है कि लोगों को अपनी पहचान के कई पहलुओं के आधार पर पक्षपात और भेद-भाव का सामना करना पड़ता है।”
AlphaGeo के संस्थापक और CEO, पराग खन्ना का दृष्टिकोण वैश्विक है और उनका मानना है कि काबिलियत को तरजीह देने की परिभाषा को नए सिरे से लिखे जाने की ज़रूरत है। विशेषज्ञता और सार्थक उन्नति को तरजीह देने वाले वाले गवर्नेंस मॉडल का हवाला देते हुए वे कहते हैं, “काबिलियत को तरजीह देने का फ़लसफ़ा तभी काम कर सकता है, जब सबसे काबिल लोग समाज के स्वरूप और दिशा के बारे में फ़ैसले ले रहे हों।”
कतर की अलग-अलग यूनिवर्सिटीज़ से आए छात्र इस पर मनन करते हैं कि ये विचार किस तरह उनकी पीढ़ी से मेल खाते हैं। हमाद बिन खलीफ़ा यूनिवर्सिटी के सामाजिक विज्ञान के 26 वर्षीय छात्र, सुंदूस सईद कहते हैं, “यह सिस्टम अक्सर यही सुनिश्चित करता है कि लोग बाहर रहें और अगर कोई ऊपर उठने की कोशिश करता है, तो स्थिति को जैसे का तैसा बनाए रखने के लिए उसके रास्ते में रुकावटें डाल दी जाती हैं।” कतर की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे 22 वर्षीय छात्र, कार्ल जैम्बो का नज़रिया इससे उलट है और वे कहते हैं, “काबिलियत को तरजीह देने वाला यह सिस्टम दरअसल आपको खुद को साबित करने का एक मंच देता है, जहाँ आप अकेले पूरी दुनिया के खिलाफ़ खड़े होते हैं।”
Doha Debates की चर्चित मजलिस शैली में फ़िल्माया गया यह वाद-विवाद, दुनिया भर के दर्शकों के लिए खुली और सच्चाई की तलाश करने वाली चर्चाओं की मेज़बानी करने के इस प्लैटफ़ॉर्म के मिशन को दर्शाता है और दर्शकों को इस पर फिर से विचार करने के लिए आमंत्रित करता है कि निष्पक्षता का क्या मतलब होता है और अलग-अलग समाज किस तरह सभी को समान अवसर देने की कवायद कर सकते हैं।
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